Tuesday, December 7, 2010

यूँ ही ...

तेरी चिट्ठियां संभल रखी है
कुछ आलू उबाल रखी है

पहले हाले-ए-दिल बतलाऊंगा
फिर आलू तल कर खाऊंगा

तू होती तो मेथी वाले, चल परांठें खाता 
बदले में तेरे सब कपड़े,  धोता और सुखाता

तू होती तो गलत सही का, फर्क मुझे बतलाती
जूते, कपड़े, भींगे तौलियें  की, सही जगह दिखलाती

अभी-अभी अपने हाथों से, कपड़े धो कर रखे है
काश अगर तू होती कहती, आप कितने अच्छे है

मगर ये वहम मेरा  है, काश अगर तू होती
साथ मेरे जैसों का पाकर, हर दिन हर पल रोती

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