Thursday, December 30, 2010

           ग़ज़ल 


मैं जो वक्त  और माहौल में ढल गया
लोग  कहते  है,    मैं  बदल गया

ना दे यूँ तर्क ना समझा, कि तू सयाना है
मुझे मालूम है, तू जोश में फिसल गया


एक उसी ढंग से कहता है, आज भी कविता
अलग से सोचने की मेहनत से, बच निकल गया


साथ रहकर तो बस, रुसवाईयाँ ही देखी थी 
वो   तो  तनहा  था,  कि संभल  गया


तुझसे उम्मीद ही कहा थी, तुझे कुछ कहता
मैं तो खुद से ही परेशान था, शाम ढल गया

मानता हूँ अँधेरी रात है,  और मजबूरी 
पर्दा ज्योंहि हटाया था, चराग जल  गया

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