Thursday, December 30, 2010

बनारस  ....

सुबह बनारस, शाम बनारस
बेफिक्री का नाम बनारस

कि जिसके पग धोती गंगा
वहीँ सजा श्मशान बनारस

ये  धरती वेदों की धरती
देवों का विश्राम बनारस

है धर्मों का संगम स्थल
काश होता हिंदुस्तान बनारस
           ग़ज़ल 


मैं जो वक्त  और माहौल में ढल गया
लोग  कहते  है,    मैं  बदल गया

ना दे यूँ तर्क ना समझा, कि तू सयाना है
मुझे मालूम है, तू जोश में फिसल गया


एक उसी ढंग से कहता है, आज भी कविता
अलग से सोचने की मेहनत से, बच निकल गया


साथ रहकर तो बस, रुसवाईयाँ ही देखी थी 
वो   तो  तनहा  था,  कि संभल  गया


तुझसे उम्मीद ही कहा थी, तुझे कुछ कहता
मैं तो खुद से ही परेशान था, शाम ढल गया

मानता हूँ अँधेरी रात है,  और मजबूरी 
पर्दा ज्योंहि हटाया था, चराग जल  गया

Tuesday, December 7, 2010

यूँ ही ...

तेरी चिट्ठियां संभल रखी है
कुछ आलू उबाल रखी है

पहले हाले-ए-दिल बतलाऊंगा
फिर आलू तल कर खाऊंगा

तू होती तो मेथी वाले, चल परांठें खाता 
बदले में तेरे सब कपड़े,  धोता और सुखाता

तू होती तो गलत सही का, फर्क मुझे बतलाती
जूते, कपड़े, भींगे तौलियें  की, सही जगह दिखलाती

अभी-अभी अपने हाथों से, कपड़े धो कर रखे है
काश अगर तू होती कहती, आप कितने अच्छे है

मगर ये वहम मेरा  है, काश अगर तू होती
साथ मेरे जैसों का पाकर, हर दिन हर पल रोती