Tuesday, November 2, 2010

               सौदागर


मुस्कान का सौदा करते है,
आंसू को खरीदा करते है.
हम चाँद को बेचा करते है,
जुगनू को खरीदा करते.

यह दौर है यारों रंजिश का,
यहाँ खून उबाले भरता है
आकर लोगों की बातों में,
चाकू को खरीदा करते है

यह कैसी है अफरा-तफरी,
भागम-भागी, मारा-मारी
कुछ पल सुकून की चाहत में,
जादू को खरीदा करते है

कुछ धर्म के ठेकेदारों ने,
स्टाल  लगाकर रखे है
लैला को बेचा करते है,
मजनूँ को खरीदा करते है

खुशियों की फ़ौज लगाई है ,
फूलों का धंधा करते है
हम लोग बनारस वालें है,
खुशबू को खरीदा करते है
" इक शहर बसता है मुझमें "



कि जब से दूर हुआ हूँ
मैं बंगलूर हुआ हूँ

जुल्म कि ठौर बनूँगा
अब मैं लाहौर  बनूँगा

हूँ मैं गंगा के नगर का वाशी
याद आने लगा मुझे काशी  

क्यों उड़ाते हो तुम मेरी खिल्ली
खौफ खाओ हूँ मैं नई दिल्ली

बात जब हुई है कोलकाता
एक ही चेहरा है मिथुन' दा जो मुझे भाता

ख्वाब मेरे भी है बनूँ  एक सितारा सुरमई
इक बसेरे कि गुज़ारिश है तुझसे मुंबई

जाने क्या देखा था उस नामुराद लड़की में
एक ही बार गया और लूट गया रुड़की में

दोस्त मेरे भी कम नहीं हाँ ज़रा दूर है
मैं बनारस में हूँ तनहा वो गाजीपुर है

क्या किसी और की  हुई है सुना है हीर
कौन समझाये था हमारा है हमारा कश्मीर

और सुन देखना जो चाहे तू मुकम्मल दुनिया
बिना पासपोर्ट और वीसा के घूम ले इंडिया



ग़ज़ल

लाश हूँ, तैर रहा हूँ
डूबने  के लिए, ज़िन्दगी चाहिए

सफ़र में हूँ, थका भी हूँ
तकिया तेरी पीठ का, अभी चाहिए

तब से प्यासा हूँ, जब से सफ़र है शुरू
तेरी होंठों की भींगी, नमी चाहिए

हाँ मैं नाराज़ हूँ, तुझसे कितना कहूं
माफ़ कर दूंगा पर कुछ अभी चाहिए

देने वाले बता, पूंछा  करते है  कब
मेरी नियत पे शक, जा नहीं चाहिए

आसमानों की मलिका, तू पहले ही है
रमता जोगी, मुझे कब ज़मीं चाहिए

तेरी उल्फत में मैं, डांट खाने लगा
'लेट' जाता हूँ दफ्तर, घड़ी चाहिए