ग़ज़ल
है मेरा दोस्त, मुझको बुरा कहता है
खुद को पहला, मुझे दूसरा कहता है
उसकी गलतफहमियाँ और ये ज़िन्दगी
खुद को शिखर, मुझे कतरा कहता है
यूँ तो आती है तरस, तेरी इस नादानी पे
नासमझ जो, पत्थर को खुदा कहता है
ये तो अंदाज़ है जीने का, भला क्यूँ छोड़ें
एक शायर है जो, क्या खूब खरा कहता है
हुस्न में क़ैद है, आशिक है, माफ़ कर देना
है गिरफ्तार जो, जुल्फों को घटा कहता है
देखा जाये तो कोई फर्क नहीं, शहरों में
बंदा भावुक है जो, बनारस को जुदा कहता है
है अगर झूठ, मेरे सिर को कलम कर देना
दिल गुनाहगार जो, चाहत को खता कहता है
तोड़ दो धर्म के मुजरिम, इन प्रतिकों को
आदमी-आदमी को, हिन्दू-मुस्लमान कहता है
बेचने वाले की फितरत नहीं पूछा करते
उसका पेशा है जो, घटिये को खरा कहता है