ग़ज़ल
लाश हूँ, तैर रहा हूँ
डूबने के लिए, ज़िन्दगी चाहिए
सफ़र में हूँ, थका भी हूँ
तकिया तेरी पीठ का, अभी चाहिए
तब से प्यासा हूँ, जब से सफ़र है शुरू
तेरी होंठों की भींगी, नमी चाहिए
हाँ मैं नाराज़ हूँ, तुझसे कितना कहूं
माफ़ कर दूंगा पर कुछ अभी चाहिए
देने वाले बता, पूंछा करते है कब
मेरी नियत पे शक, जा नहीं चाहिए
आसमानों की मलिका, तू पहले ही है
रमता जोगी, मुझे कब ज़मीं चाहिए
तेरी उल्फत में मैं, डांट खाने लगा
'लेट' जाता हूँ दफ्तर, घड़ी चाहिए
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