ग़ज़ल..
मंजिल से ज्यादा मुझको, सफ़र मायने रखता है
मोहब्बत अगर हो भी,तो मुख़्तसर मायने रखता
हद से ज्यादा हो तो , इश्क भी उबा दे ता है
बूँद-बूँद में हो तो ज़हर भी, मायने रखता है
तेरे बगैर शाम क्या, सहर क्या, रात क्या
तू अगर पास हो, तो दोपहर भी मायने रखता है
मंजिल से ज्यादा मुझको, सफ़र मायने रखता है
मोहब्बत अगर हो भी,तो मुख़्तसर मायने रखता
हद से ज्यादा हो तो , इश्क भी उबा दे ता है
बूँद-बूँद में हो तो ज़हर भी, मायने रखता है
तेरे बगैर शाम क्या, सहर क्या, रात क्या
तू अगर पास हो, तो दोपहर भी मायने रखता है
No comments:
Post a Comment